Monday, 3 July 2017

दोहे सावन पर

दोहे [सावन पर ]

नभ पर बादल गरजते ,घटाएँ है घनघोर ।
रास रचाये दामिनीे  ,मचा  रही  है शोर ॥

आँचल लहराती  हवा ,पड़े ठंडी फुहार |
उड़ती जाये चुनरिया ,बरखा की बौछार ||

सावन बरसा झूम के ,भीगा तन मन आज ।
पेड़ों पर झूले पड़े ,, बजे है मधुर साज़ ॥

भीगा सा मौसम यहाँ  ,भीगी सी है रात ।
भीगे से अरमान है ,आई है बरसात ॥

कुहुक रही कोयल यहाँ, अम्बुआ डार डार।
हरियाली छाई रही,चहुँ ओर है बहार

रेखा जोशी