Friday, 23 June 2017

बेवफाई तो उनकी भूल चुके थे ज़िन्दगी में

आसमान  में आज फिर काली घटा घिर आई है
जाने  क्यों आज  तेरी  याद दिल में फिर आई है
बेवफ़ाई तो   उनकी  भूल चुके  थे   ज़िन्दगी  में
मुद्द्त बाद  आज  हमारी  आँख क्यों भर आई है

रेखा जोशी

है गांव में रहते जो बन्धु भाई

गांव में रहते  जो बन्धु भाई है
देते हम उन को आज बधाई है
रूप बदल रहे है वोह भारत का
सुन्दर तस्वीर गांव की बनाई है

रेखा जोशी

यही तो है ज़िन्दगी

ज़िन्दगी
यही तो है ज़िन्दगी
कहीं धूप,छांव है कहीं
बहती धारा वक्त की
सुख दुख किनारों के बीच
जश्न मानते कहीं
कोई ढोते
गम का बोझ कहीं

ज़िन्दगी
यही तो है ज़िन्दगी
आज ख़ुशी का आलम
तो
कल मातम कहीं
फिर भी
थमती ज़िन्दगी नहीं
दामन में इसके
कोई हँस  रहा है
कोई रो रहा है
सफर ज़िन्दगी का
यूँही
चलता जा रहा है
चलता जा रहा है

रेखा जोशी

बीता ज़माना बचपन का


मुस्कुरा
उठे है फूल
मन उपवन में मेरे
याद
आते ही वोह
बीता ज़माना
बचपन का

टेढ़ी मेढ़ी
गाँव की पगडंडियाँ
लहलहाते हरे भरे
खेत
सोंधी सोंधी
माटी की महक
खिलखिलाती फसल संग
वोह
खिलखिलाता ज़माना
बचपन का

भरी दोपहरी में
घर के आंगन में
मिल कर नित
खेल नये नये खेलना
गिल्ली डंडा
चोर सिपाही
गोल गोल घूमते
लट्टू से
मचलता मन
याद आता है बहुत
वोह
मचलता  ज़माना
बचपन का

बरसाती पानी की
लहरों में
वोह
कागज़ की नाव का
लहलहराना
हिलोरे देता
मन उपवन को मेरे
याद आता है बहुत
वोह
बीता ज़माना
बचपन का

रेखा जोशी

Wednesday, 21 June 2017


है  होती  सास    बहू में   तकरार
फिर भी करती वह आपस मे प्यार
एक का बेटा तो दूसरी का पति
जुड़े जिससे उनके दिलों के तार

रेखा जोशी

Monday, 19 June 2017

पिता


दुनिया की भीड़ में भरे जाने कितने तक्षक
रक्षा करे हमारी हर मोड़ पर  पिता रक्षक
है सिखाता चलना हमे वह जीवन के पथ पर
जीवन की अनजानी राहें पिता मार्गदर्शक

रेखा जोशी

Saturday, 17 June 2017

पापा जैसा कोई नहीं ,पूर्वप्रकाशित रचना

अमृतसर के रेलवे स्टेशन पर गाड़ी से  उतरते ही मेरा दिल खुशियों से भर उठा  ,झट से ऑटो रिक्शा पकड़ मै अपने मायके पहुंच गई,अपने बुज़ुर्ग माँ और पापा को देखते ही न जाने क्यों मेरी आँखों से आंसू छलक आये , बचपन से ले कर अब तक मैने अपने पापा के घर में सदा सकारात्मक उर्जा को महसूस किया है ,घर के अन्दर कदम रखते ही मै शुरू हो गई ढेरों सवाल लिए ,कैसो हो?,आजकल नया क्या लिख रहे हो ?और भी न जाने क्या क्या ,माँ ने हंस कर कहा ,''थोड़ी देर बैठ कर साँस तो ले लो फिर बातें कर लेना ''| अपनी चार बहनों और एक भाई में से  मै सबसे बड़ी और सदा अपने पापा की लाडली बेटी रही हूँ ,शादी से पहले कालेज से आते ही घर में  जहाँ मेरे पापा होते थे मै वहीं पहुंच जाती थी और जब तक पूरे दिन का लेखा जोखा उन्हें बता नही देती थी तब तक मुझे चैन ही नही पड़ता था | मै और मेरे पापा न जाने कितने घंटे बातचीत करते हुए गुज़ार दिया करते थे ,समय का पता ही नहीं चलता था और मेरी यह आदत शादी के बाद भी वैसे ही बरकरार रही ,ससुराल से आते ही उनके पास बैठ जाती थी लेकिन मेरी मम्मी हमारी इस आदत से बहुत परेशान हो जाती थी ,वह बेचारी किचेन में व्यस्त रहती और मै उनके साथ घर के काम में  हाथ न बंटा कर अपने पापा के साथ गप्प लगाने में व्यस्त हो जाती थी ,लेकिन आज अपने पापा के बारे में लिखते हुए मुझे बहुत गर्व हो रहा है कि मै एक ऐसे व्यक्ति की बेटी हूँ जिसने जिंदगी की चुनौतियों को अपने आत्मविश्वास और मनोबल से परास्त कर सफलता की ओर अपने कदम बढ़ाते चले गए |

मात्र पांच वर्ष की आयु में उनके पिता का साया उनके सर के ऊपर से उठ गया था और मेरी दादी को अपने दूधमुहें बच्चे ,मेरे चाचा जी के  साथ अपने मायके जा कर जिंदगी की नईशुरुआत करनी पड़ी थी जहां उन्होंने अपनी अधूरी शिक्षा को पूरा कर एक विद्यालय प्रचार्या की नौकरी की थी और मेरे पापा अपने दादा जी की छत्रछाया में अपने गाँव जन्डियाला गुरु ,जो अमृतसर के पास है ,में रहने लगे | उस छोटे से गाँव की छोटी छोटी पगडण्डीयों पर शुरू हुआ उनकी जिंदगी का सफर ,मीलों चलते हुए उनकी सुबह शुरू होती थी ,वह इसलिए कि उनका स्कूल गाँव से काफी दूर था ,पढ़ने में वह सदा मेधावी छात्र रहे थे  और इस क्षेत्र में उनके मार्गदर्शक रहे उनके चाचाजी जी जो उस समय एक स्कूल में अध्यापक थे | दसवी कक्षा  से ले कर बी ए  की परीक्षा तक उनका नाम मेरिट लिस्ट में आता रहा था ,बी ए की परीक्षा में उन्होंने  पूरी पंजाब यूनिवर्सिटी में तृतीय स्थान प्राप्त कर अपने अपने गाँव का नाम रौशन किया था |धन के अभाव के कारण,पढ़ने के साथ साथ वह ट्यूशन भी किया करते थे ताकि मेरी दादी और चाचा जी की जिंदगी में कभी कोई मुश्किलें न आने पाए | दो वर्ष उन्होंने अमृतसर के हिन्दू कालेज में भौतिक विज्ञान की  प्रयोगशाला में सहायक के पद पर कार्य किया और आगे पढ़ाईज़ारी रखने के लिए धन इकट्ठा कर अपने एक प्राध्यापक प्रो आर के कपूर जी की मदद से आदरणीय श्री हरिवंशराय बच्चन के दुवारा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के भौतिकी विभाग में एम् एस सी पढ़ाई के लिए प्रवेश लिया |अपने घर से दूर एम् एस सी की पढ़ाई उनके लिए एक कठिन चुनौती थी,यहाँ आ कर मेरे पापा का स्वास्थ्य बिगड़ गया ,किसी इन्फेक्शन के कारण वह ज्वर से पीड़ित रहने लगे और उप्पर से धन का आभाव तो सदा से रहता रहा था ,इसलिए यहाँ पर भी वह पढ़ने के साथ साथ ट्यूशन भी करते रहे जिसका सीधा असर उनकी पढ़ाई पर पड़ा ,जैसे तैसे कर के वह प्रथम वर्ष के पेपर दे कर वापिस अमृतसर आगये |इसी समय मेरी मम्मी इनकी जिंदगी सौभाग्य ले कर आई .मेरे  चाचा जी  बैंक में नौकरी लगने के कारण पापा घर परिवार कि ज़िम्मेदारी माँ पर छोड़ कर अपनी पढ़ाई का द्वितीय वर्ष पूरा करने वापिस इलाहाबाद चले गए,उसके बाद अमृतसर के हिन्दू कालेज में लेक्चरार के पद पर आसीत हुए ,उसी कालेज में हेड आफ फिजिक्स डिपार्टमेंट बने औऱ वाइस प्रिंसिपल के पद से रिटायर्ड हुए |उसके बाद वह लेखन कार्य से जुड़ गए ,हिंदी साहित्य में उनकी सदा से ही रूचि रही है ,उन्होंने श्रीमद्भागवत गीताका पद्धयानुवाद  किया,उनके दुवारा लिखी गई पुस्तके , मै तुम और वह ,तुम ही तुम ,आनंद धाम काफी प्रचलित हुई और उन्हें कई पुरुस्कारों से भी सम्मानित किया गया |

पापा हम सभी बहनों और भाई के गुरु ,पथप्रदर्शक और मित्र रहें है ,उन्ही की दी हुई शिक्षा ,प्रेरणा और संस्कार है जिसके चलते हम सभी ने नौकरी के साथ साथ बहुत सी उपल्ब्दियाँ भी हासिल की है |इस वृद्धावस्था में भी उनका मनोबल बहुत ऊंचा है ,आज भी अपने कार्य वह स्वयम करना पसंद करते है ,मेरी  ईश्वर  प्रार्थना है वह सदा स्वस्थ रहे और अपना लेखन कार्य करते रहे |

रेखा जोशी

सभी वो तोड़ बन्धन अब उड़े हैं आसमानों में
परिंदे कब रहा करते हैं हर दम आशियानों में
...
न रोको तुम न बांधों आज ज़ंजीरें यहाँ पर तुम
रहेंगे कब तलक छुप कर परिंदे इन मकानों में
....
कहीं तुम दूर उड़ जाना बसा लेना नया घर फिर
न रोकेंगे चले जाना नयें अपने ठिकानों में
....
न भरना आँख में आँसू न मुड़ कर देखना हम को
चले जाना यहाँ से दूर खोये तुम उड़ानों में
....
सदा तेरे लिये हमने खुदा से प्यार ही माँगा
करेंगे याद हम तुमको सदा अपने फसानों में

रेखा जोशी

महालक्ष्मी 'मापनीयुक्त वर्णिक छंद
212 212 212

साथ तेरा मिला जो पिया
आज लागे नहीं  है जिया
पास  आओ  हमारे अभी
काश आ के न जाओ कभी
....
देख के रूप तेरा पिया
चाँद भी आज शर्मा गया
रात को रौशनी है मिली
मीत मै  संग तेरे चली
....
है ख़ुशी आज गाते  रहें
ज़िन्दगी जाम पीते रहें
प्रीत को  तोड़ जाना नही
छोड़ना साथ आता नही
,
बाग में अब कली है खिली
जिंदगी में   खुशी है  मिली
साथ  तेरा  हमें  जो  मिला
ज़िन्दगी से नही अब गिला
,
प्यार अब ज़िन्दगी से मिला
अब चलेगा यही सिलसिला
मीत  आये  यहां   ज़िन्दगी
गीत  गाये  यहां    ज़िन्दगी

रेखा जोशी

Friday, 16 June 2017

नाम ले कर पिया करते जाप


नाम ले कर पिया करते जाप
नही मिले फिर भी साजनआप
जब से गये तुम छोड़ कर हमें
जीवन हमारा बना अभिशाप

रेखा जोशी

Tuesday, 13 June 2017

दो मुक्तक

स्तुति

गौरीपुत्र  हे   विघ्नेश्वर   करें   तेरा ध्यान
विघ्नहर्ता   विघ्न   हरो   हम  तेरी सन्तान
स्तुति   वन्दन  कर शीश झुकाते   अपना
बुद्धि में आन विराजो मिले विद्या का ज्ञान
,
निन्दा

बुद्धि बल दिया सभी कुछ भगवान
न करना तुम   किसी  का अपमान
निन्दा किसी की कभी   न कीजिये
है  ईश्वर   की  हम  सभी   सन्तान

रेखा जोशी

Monday, 12 June 2017

झूमता सावन

चलती  ठंडी हवायें झूमता सावन आया
नभ गरजे  बदरा  बिजुरी लहराये
अब छाई हरियाली  मौसम है मन भाया
नाचे मोर आंगन में जियरा हर्षाये
झूला झूलती सखियाँ  गाती कोयलिया गीत
पिया गये परदेस  लागे नाहि जियरा
बरसा पानी नभ से पपीहा गुनगुनाया
आये याद प्रियतम है गोरी शर्माये

रेखा जोशी

रखें देश का मान है प्यारे


रखें देश का मान है प्यारे
दे कर अपनी जान है प्यारे

गोला बारूद आग है सब
मौत का सामान है प्यारे
,
है साया आतंक का छाया
दहशत में अब जान है प्यारे
,
घुस आये आतंकी शहर में
सड़कें अब सुनसान है प्यारे
,
देश की खातिर अब मर मिटना
होना अब कुर्बान है प्यारे

रेखा जोशी

छंद लौकिक अनाम


                           
छंद ..लौकिक अनाम मात्राभार २२ यति ११/११,मापनीमुक्त,पदान्त 2 गुरु
    
गीतिका..
 
छाई काली घटा,सखी सावन आया
झूमें मोरा जिया,गगन  बादल  छाया
,
बादल गरजे घनन ,जिया धड़के मोरा
भीगा तन मन आज , पिया बिना न भाया
,
हरियाली चहुँ ओर , हवा है मतवाली
अँगना नाचे  मोर, गीत कोयल गाया
,
झूला झूले आलि , खिली झूमती बगिया
सोंधी सोंधी  महक,फूल  उपवन हर्षाया
,
परदेस गये पिया, नही कुछ भी भाये
बिजुरी चमकी गगन ,ह्रदय है दहलाया

रेखा जोशी

Sunday, 11 June 2017

चमकते नयन तुम्हारे

कुछ खोजते देखते
जिज्ञासा से भरे
ढूंढ रहे कुछ
चमकते नयन तुम्हारे
,
अनगिनत ख्वाब
नैनों में सँजोये
पूरा होना चाह रहे
प्रफुल्लित उत्साहित
कुछ नवसृजन
करने को आतुर
चमकते नयन तुम्हारे
,
लड़कपन की चाह
कुछ कर गुजरने की
तमन्ना 
झलकती नैनों से
तुम्हारे
मन में है विश्वास
पूरे होंगे सपने
जो देख रहे
खुली आँखों से
चमकते नयन तुम्हारे

रेखा जोशी

बहाया क्यों खून गोली से यहाँ


न जाने तेरा है कौन सा ख्वाब
चाहिए बस चंद नोट और शराब
बहाया क्यों खून गोली से यहाँ
देना होगा तुम्हे इसका  जवाब

रेखा जोशी

Saturday, 10 June 2017

ग़ज़ल

212. 212. 212. 212

टूट कर दिल हमारा पिया रह गया
ज़िन्दगी का सजन फलसफा रह गया
,
रात भर देखते हम रहे ख्वाब ही
कब हुई सुबह बस देखता रह  गया
,
उम्र गुज़ारी सजन दर्द दिल मे लिए
अब यहाँ दर्द का सिलसिला रह गया
,
यूँ सताओ न तुम ज़िन्दगी अब हमें
तीर दिल मे हमारे चुभा रह गया
,
काश मिलती हमें ज़िंदगी में  खुशी
ज़िन्दगी से यही  इक गिला रह गया

रेखा जोशी

आधार छंद सुमेरु

आधार छंद - सुमेरु
मापनी - 1222 1222 122

समांत - आना <> पदांत - आ गया है

हमें भी मुस्कुराना आ गया है
पिया से दिल  लगाना आ गया है,
,
चली ठंडी हवायें अब यहाँ पर
हमें भी  गुनगुनाना आ गया है
,
मिले जो तुम मिला सारा जहाँ अब
यहाँ मौसम सुहाना आ गया है
,
खिला उपवन  यहां गाती फ़िज़ाये
बहारों का ज़माना आ गया है
,
बंधी  है प्रीत की यह आज डोरी
उन्हें अपना बनाना आ गया है

रेखा जोशी

Friday, 9 June 2017

धरतीपुत्र

धरा  से    सोना उगाता
है   धरतीपुत्र   कहलाता
भर कर सबका पेट कृषक
वह खुद भूखा सो जाता

रेखा जोशी

नदी नाले रहें है सूख सूखा है यहाँ हर वन

1222  1222  1222. 1222

नदी नाले रहे है सूख सूखा है यहाँ हर वन
सरोवर  ताल सूखे तड़पता है अब यहाँ जन जन
धरा सूखी यहाँ पौधे रहे है सूख बिन पानी
हमें है  आस घिर घिर आज  बरसेगा यहाँ सावन

रेखा जोशी

Thursday, 8 June 2017

जब रात में सिमट जाता उजाला सजन

जब  रात में सिमट जाता उजाला सजन
सुबह लाती फिर खुशियों की माला सजन
,
देख   तेरे   नैन  हम  देखते  रह गये
भूल गये फिर सदा  मधुशाला  सजन
,
हर कर्म हम करेंगे साजन साथ साथ
रंग में अपने हमें  रंग डाला सजन
,
सुन्दर सलोना  बनायेंगे घर अपना
संग संग खायेंगे फिर निवाला सजन
,
साथी हाथ बढ़ा कर देना साथ सदा
संग जो तुम हो बना घर शिवाला सजन

रेखा जोशी

प्यार में हमको सजन बहकाने लगे

प्यार में  हमको  सजन  बहकाने लगे
जख्म हम को मिले वोह छिपाने लगे
,
जो  देता  हमे सहारा   मुश्किलों   में
उस सफीने को फिर क्यूँ  डुबाने लगे
,
उनके आने की खबर  सुनते ही हम
फूल राह में सजन  हम बिछाने लगे
,
जीने की तमन्ना नही बिन तेरे पिया
मौत का सामान हम  अब सजाने लगे
,
भूल जायें तुम्हे दम नही है इतना
पर याद तेरी दिल से मिटाने लगे
,
रेखा जोशी

Wednesday, 7 June 2017

है   प्रेम में  श्याम  के  डूबी   राधिका
मुरली की तान सुन झूम उठी राधिका
कान्हा  समाया  राधा  के   अंग अंग
रंग  के कृष्णा  के रंग   गई  राधिका

रेखा जोशी 

Tuesday, 6 June 2017

पुकारो ज़िन्दगी जी लो यहाँ हर पल

मुक्तक

सजन तेरी हमे जब याद आती है 
ख़ुशी रह रह सनम तब गीत गाती है 
पुकारे ज़िंदगी जी लो यहाँ हर पल 
सजन अब  ज़िंदगी भी मुस्कुराती है

रेखा जोशी

बेवफा सजन से प्यार क्या करना


बेवफा  सजन से प्यार क्या करना
दर्द ए  गम का इकरार क्या करना
है  रूठी   हमसे   तकदीर  अपनी
टूटे  दिल  का इज़हार क्या करना

रेखा जोशी

है मीत बहुत मिले हमे इस अजीब ओ गरीब दुनिया में

है  मीत बहुत मिले हमें  इस अजीब ओ गरीब दुनिया में
मिला  न हमे   ऐसा  कोई  बने  मेरा  नसीब   दुनिया मे
आज से ,अब से,अभी अभी से,मुझे  तुम्हारा प्यार कबूल
तेरे  सिवा कोई  भी न आया दिल  के करीब  दुनिया में

रेखा जोशी

Saturday, 3 June 2017

वक्त  की धारा  में सदा  बहता जीवन
कहीं दुख के सागर  में  डूबता जीवन
आओ जियें हर ऋतू हर मौसम हम यहाँ
कहीं गागर ख़ुशी से यह भरता जीवन
,
है  शतरंज  की  बिसात  पर  टिकी यह ज़िन्दगी
सोच समझ चलना घात पर टिकी  यह  ज़िन्दगी
न   जाने  कब  चल  दे   कोई    टेढ़ी  चाल  यहां
हमारी शह और  मात पर   टिकी  यह  ज़िन्दगी

रेखा जोशी

Friday, 2 June 2017

न करना कभी अभिमान से तुम प्यार
अपने जीवन  को तुम  लो अब सँवार
तर   जायेगा   इस   जग  से  तू  बन्दे
काम  क्रोध  मद  लोभ का कर संहार

रेखा जोशी

तुमसे  मिले  प्रियतम  हमे जमाना हो गया
प्यार हमारा अब सजन अफसाना हो गया
क्यों अकेले  गये   छोड़   हमें परदेश पिया
रोका  दिल को  कमबख्त दीवाना हो गया

रेखा जोशी

Thursday, 1 June 2017

सुहाना मौसम औऱ नदी का किनारा

सुहाना   मौसम और नदी का किनारा
बहारों   ने   पिया   नाम   तेरा पुकारा
आंखों से हमारी प्यार पढ़ लो  साजन
शायद मिले न फिर यह मौका दोबारा

रेखा जोशी

कैसे जियेंगे मिलकर जहाँ में हंसते हुए

कैसे  जियेंगे  मिलकर जहाँ  में हँसते हुए
टूट जायेंगे  हम  ज़िन्दगी  यह  सहते हुए
बीत जायेगी यह ज़िन्दगी हमारी इक दिन
कभी  दुआ तो कभी बद्दुआ से लड़ते हुए

रेखा जोशी

मुक्तक

है  शतरंज  की  बिसात  पर  टिकी यह ज़िन्दगी
सोच समझ चलना घात पर टिकी  यह  ज़िन्दगी
न   जाने  कब  चल  दे   कोई    टेढ़ी  चाल  यहां
हमारी शह और  मात पर   टिकी  यह  ज़िन्दगी

रेखा जोशी

Wednesday, 31 May 2017

फूलों को बगिया में मुस्कुराते देखा

फूलों को  बगिया  में मुस्कुराते  देखा
भँवरों को भी गुन गुन गुनगुनाते देखा
कुहुक रही  कोयलिया यहाँ डार डार
तितली  को  भी उत्सव  मनाते  देखा

रेखा जोशी

Tuesday, 30 May 2017

धड़कन बस में नहीं हमारी है


फ़ूलों से सजी आज क्यारी है
अँगना खिली आज फुलवारी है
छाई  मोहब्बत चहुँ ओर आज
धड़कन बस में नहीं हमारी है

रेखा जोशी

गहराती शक की खाईयों में


छलकते रहे नयन
बहते रहे आँसू
खाते रहे कसमे हम
ज़िन्दगी भर
देते रहे दुहाई हम
अपनी वफ़ा की
लेकिन
गहराती शक की
खाईयों में
मिट गई उल्फत मेरी

देख उनको
कभी
थी बजा करती दिल मे
शहनाईयां
पर मिली ज़िन्दगी में हमे
रुसवाईयाँ
लेकिन गहराती रही
शक की खाईयां
वक्त चलता रहा
फासले बढ़ते रहे
दूर दिल होते रहे
पास रहते हुये भी  उनसे
जुदा हो गये

रेखा जोशी

Monday, 29 May 2017

दूर दोनों आज सबसे ,चलें हम उसपार

2122 2122, 2122 21
दूर दोनों आज सबसे ,चलें हम उसपार
अब खिलेगा ज़िन्दगी में,प्यार का संसार
,
चल रहे हम साथ ले कर, हाथ में अब हाथ
प्यार की हम पर यहाँ बरसे सदा बौछार
..
राह मुश्किल जान कर तुम ,रुकना मत आज
फिर करेगी आज हम पर   ,ज़िन्दगी उपकार
,
साथ मिल कर जब चले हम ,मीत रहना पास
कर लिया तेरी सजन अब,प्रीत को स्वीकार
,
तुम निभाना साथ मेरा, हम रहेंगे साथ
है खुशी अब ज़िन्दगी में,तुम देना अधिकार

रेखा जोशी

न जाने सजन क्यों खफा हो रहा है

122. 122. 122. 122

न जाने  सजन क्यों खफा हो रहा है
हमें दर्द दे कर जुदा हो रहा है
,
निभाई नही प्रीत  उसने कभी भी
किया प्यार उसने गुमा हो रहा है
,
सताये हमें याद तेरी कहाँ  हो
रहे जागते  क्या यहाँ हो रहा है
,
गये छोड़ हमको सजन तुम कहाँ पर
बिना प्यार जीवन सजा हो रहा है
,
रहे हम अकेले रहा प्यार तन्हा
किसी का नहीं अब भला हो रहा है

रेखा जोशी

Friday, 26 May 2017

रिश्ते पनपते जहां प्यार हो आधार

रिश्ते  पनपते जहां  प्यार  हो आधार
बीत गये दिन कभी रिश्तों में था प्यार
रिश्तों  में उगने  लगी आज  नागफनी
जीवन का समझ मे आता है अब सार

रेखा जोशी

प्यार बिन नैन खोते हमारे

212 212 2122

प्यार   बिन  चैन  खोते हमारे
याद    में   नैन   रोते    हमारे
जी लिये चार दिन ज़िन्दगी के
काश   तुम   संग  होते  हमारे

रेखा जोशी

राजनीति करते नेता कैसे कैसे हमारे


राजनीति  करते  नेता  कैसे  कैसे हमारे
भाई भाई को  लड़ाते  यहाँ  कैसे सुधारें
अपने फायदे के लिये कराते दंगा फसाद
सोचे जनता अपने भारत को कैसे सँवारे

रेखा जोशी

Thursday, 25 May 2017

ग़ज़ल

1222 1222

सजन इकरार कर लेना
हमारा प्यार पढ़ लेना
,
खिला उपवन रँगी मौसम
नज़ारे  यार  पढ़   लेना
,,
निगाहों में समाये तुम
हमें दिलदार पढ़ लेना
,,
लिखा है नाम हाथों पर
हिना के पार पढ़ लेना
,,
पुकारते कँगन तुम को
पिया इज़हार पढ़ लेना

रेखा जोशी

है संघर्ष यह जीवन


है संघर्ष यह जीवन 
कब गुज़रा बचपन
याद नही
आया होश जब से
तब  से
हूँ भाग रहा
संजों रहा खुशियाँ
सब के लिए
थे अपने कुछ थे पराये
उम्र के इस पड़ाव में
आज निस्तेज
बिस्तर पर पड़ा 
हूँ समझ रहा 
अपनों को और परायों को
था कल भी
हूँ आज भी
संघर्षरत
तन्हा सिर्फ तन्हा

रेखा जोशी

गुड़ गुड़ हुक्का पीता ताऊ यहाँ पर

दूध   दही  जमाये   ताई   गांव  में
कूप  से  जल  लाये  ताई   गांव में
गुड़ गुड़ हुक्का पीता ताऊ यहाँ पर
चारपाई    बिछाये  ताई   गांव   में

रेखा जोशी

Wednesday, 24 May 2017

खुशनसीब हूँ तेरा सहारा मिला


साथ जब से हमें है तुम्हारा मिला
डूबते हुए  को अब किनारा मिला
है मिली खुशी जीवन मे तुमसे ही
खुशनसीब  हूँ तेरा  सहारा  मिला

रेखा जोशी

Tuesday, 23 May 2017

पर्यावरण गीत

प्रकृति का गीत है पर्यावरण
वनों का प्रतीक है पर्यावरण
पर्यावरण यह  पर्यावरण
,
साँसे है तंग इन् हवाओं में
घुला है ज़हर इन फ़िज़ाओं में
हमे करना है  इसका दमन
प्रकृति का गीत है पर्यावरण
,
कुहुके कोयलिया पंछी चहके
है खिले फूल  बगिया महके
गा रहे गीत झरने छना छन
प्रकृति का गीत है पर्यावरण
,
प्रदूषण ने फैलाया यहाँ जाल
है  लिपटी धरा उसमें ये आज
बचाना धरती का है आवरण
प्रकृति का गीत है पर्यावरण
,
चहुँ ओर फैल रहा हाहाकार
कटे पेड़ों से  बिगड़ा आकार
बचाना इनको है हमारा धर्म
प्रकृति का गीत है पर्यावरण
,
धरा में आज मिल खुशियां बो दें
लहलहाने दें   ये पेड़ पौधे
दे रहे  हर पल हमें  ये जीवन
प्रकृति का गीत है पर्यावरण
,
प्रकति का गीत है पर्यावरण
वनों का प्रतीक है पर्यावरण
पर्यावरण यह  पर्यावरण

रेखा जोशी

ग़ज़ल


बहरे- मुतकारिब मुसमन सालिम
अर्कान= फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
तक़्तीअ= 122, 122, 122, 122

तिरा प्यार जब से हमारा हुआ है
सफर ज़िन्दगी का सुहाना हुआ है
,
कहानी कहे आज सारा जहाँ यह
किया आज इकरार चर्चा हुआ है
,
मिला साथ तेरा खिली अब बहारें
यहाँ बाग में फूल महका हुआ है
,
करो तुम सजन प्यार की आज बातें
यहाँ दिल हमारा दिवाना हुआ है
,
निभाना सदा साथ ना छोड़ जाना
तिरे ही लिये खास  आना हुआ है

रेखा जोशी

Monday, 22 May 2017

क्षणिकाएँ

दूर से आई
शहर में तेरे
साँसें हुई तंग
उठ रहा
धुआँ धुआँ
,
रह गई दंग
देख चकाचौंध
जगमगाते मॉल
है रंगबिरंगा जीवन
शहर में
,
तेरे शहर में
है भीड़ ही भीड़
हर तरफ
फिर भी
है सब तन्हा तन्हा
,
भावनायें शून्य
पत्थर की बैसाखियाँ
लिये
घूमते रहते
दर ब दर
लोग यहां
शहर में

रेखा जोशी

कर खुद से अपनी पहचान

नारि   महिमा   तेरी     महान
करूँ इसका किस विधि बखान
महादेव   की    शिवा   हो  तुम
कर  खुद  से   अपनी  पहचान

रेखा जोशी

Friday, 19 May 2017

कहीं तो ज़िन्दगी मिलती हमें तुम

1222  1222  122

कभी करते किसी से प्रीत हम भी
कभी  तो  मुस्कुराते  मीत हम भी
कहीं तो ज़िन्दगी मिलती हमें तुम
जहाँ   में   गुनगुनाते गीत हम भी

रेखा जोशी

है ,जिंदगी भी कैसी अजब पहेली

है ज़िन्दगी भी कैसी अजब पहेली
है दो पाटों में बटी  ये जीवन शैली
है मखमल का बिछौना किसी का धरा
कहाँ  राजा  भोज  कहाँ गंगू तेली

रेखा जोशी

Thursday, 18 May 2017

जानता है मुझे पहचानता नही

वो तो  मुद्दत से जानता है मुझे
जानता है मुझे  जानता है मुझे
जानता है मुझे  पहचानता नहीं
वो  तो मुद्दत से जानता है मुझे
,
रात  भर करवटे  हम बदलते रहे
तकिये में मुहं  छुपा सिसकते रहे
नही समझे वो मेरे जज़्बात कभी
नही अपना   वोह  मानता है मुझे
,
वो तो  मुद्दत से जानता है मुझे
जानता है मुझे  जानता है मुझे
जानता है मुझे  पहचानता नहीं
वो  तो मुद्दत  से जानता है मुझे
,
किया प्यार मिली नही मुहब्बत हमें
बीती ज़िन्दगी  यूँहि तड़प तड़प के
बहारों  में  क्यों मिली हमें है खिज़ा
जानता है   नही  समझता है   मुझे
,
वो तो  मुद्दत से जानता है मुझे
जानता है मुझे  जानता है मुझे
जानता है मुझे  पहचानता नहीं
वो  तो मुद्दत  से जानता है मुझे

रेखा जोशी


 छन्द [कुकुभ]

हे माखनचोर नन्दलाला ,है मुरली मधुर बजाये 
धुन सुन  मुरली की गोपाला ,राधिका मन  मुस्कुराये
चंचल नैना चंचल चितवन, राधा को मोहन  भाये  
कन्हैया से  छीनी मुरलिया  ,बाँसुरिया  अधर लगाये

मुक्तक 

हे माखनचोर नन्दलाला ,है मुरली मधुर बजाये 

धुन सुन  मुरली की गोपाला ,राधिका मन   मुस्कुराये 

चंचल नैना चंचल चितवन,  प्रीत लगी गोपाला से 

कन्हैया से छीनी मुरलिया  , बाँसुरिया अधर लगाये 

रेखा जोशी 

Wednesday, 17 May 2017

तांका(पिता पर)

तांका (पिता पर)

1पालनहार
प्रणेता छत्रछाया
करता प्यार
अवतरित हुआ
धरती पर तात
....
2
मार्गदर्शक
है अनजानी राहें
पिता रक्षक
है सिखाता चलना
जीवन पथ पर

रेखा जोशी

Tuesday, 16 May 2017

खुशी हो या गम जियेंगे मरेंगे हम साथ साथ

संग  संग  रहेंगे  सदा, अब  यह  कहानी हमारी है
तोता-मैना   बहुत   सुने , अब   तेरी -मेरी  बारी है
खुशी हो या गम जियेंगे मरेंगे हम सदा साथ साथ
हमारे कदमों तले अब,प्रियतम यह दुनिया सारी है

रेखा जोशी