Monday, 21 August 2017

जूही बेला मोंगरा की कली

जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
संवारती घर पिया का
गाती गुनगुनाती
.
पीर न उसकी
जाने कोई
दर्द सबका अपनाती
खुद भूखी रह कर भी
माँ का फ़र्ज़ निभाती
जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
.
कोई उसको समझे न पर
रोती लुटती बीच बाजार
रौंदी मसली जाती
गंदी नाली में दी जाती फेंक
चाहेकितना करे चीत्कार
तड़पाता उसे ज़ालिम सँसार
खरीदी बेचीं जाती
जूही बेला मोंगरा की कली
झूठी मुस्कान होंठो पर लिये
आखिर मुरझा जाती

जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
रेखा जोशी

Sunday, 20 August 2017

रिश्ते

देखे दुनिया कीभीड़ में
हमने
बिखरते रिश्ते
जीवन की भाग दौड़ में
सिसकते रिश्ते
छूटते रिश्ते

भाषा प्रेम की
कोई नहीं जानता
देखे
पत्थरों के शहर में
टूटते रिश्ते

रिश्ते रिश्ते
है देखे हमने
बनते बिगड़ते रिश्ते
छल फरेब
ईर्ष्या द्वेष से नहीं
प्यार और मुहब्बत से
हैं जुड़ते
और
संवरते रिश्ते

रेखा जोशी 

Saturday, 19 August 2017

वफ़ा की आस थी वह बेवफ़ा है

नहीं कुछ प्यार में अब तो रखा है
वफ़ा की आस थी वह बेवफ़ा है
,
दिखायें हम किसे यह ज़खम दिल के
रही अब ज़िन्दगी बन के सजा है
,
गिला शिकवा कभी कोई नहीं अब
सिला क्या प्यार का हमको मिला है
,
मिला है दर्द ही तो ज़िन्दगी में
जिगर में दर्द को हमने रखा है
,
हमें छोड़ा अकेला ज़िन्दगी ने
न जाने क्या हुई हमसे खता है
,
खिली है धूप आंगन में सभी के
लगाया रात ने डेरा यहां है
,
खता हमसे हुई वो माफ कर दे
पिया कदमों तले यह सर झुका है
,
कभी तुम फिर हमें मत याद करना
मिटाया नाम दिल पर जो लिखा है
,
निगाहों से पिलाया जाम तुमने
असर यह प्यार का कैसा हुआ है
,
मुझे तू  प्यार से इक बार तो मिल
जिगर दिल खोल कर अपना रखा है
,
नहीं चाहत हमें अब प्यार की पर
बता दें तू पिया क्या चाहता है

रेखा जोशी

Friday, 18 August 2017

थोथा चना बाजे घना


शांत  गहरे सागर रहते
झर झर झर झरने छलकते
,
ज्ञानी मौन यहां पर रहें
पोंगे पण्डित ज्ञान  देवें
,
थोथा चना बाजे घना
गुणगान करे अपना यहां
,
कुहू कुहूक कोयल गाए
राग गाता  कागा जाए
,
आधा अधूरा ज्ञान लिए
गुणों का अपने गान करे

रेखा जोशी

Wednesday, 16 August 2017

बहारें ज़िन्दगी में प्यार ले कर आप आयें है

विधाता छंद
1222. 1222. 1222. 1222

बहारें ज़िन्दगी में प्यार ले कर आप आयें हैं
कलम से खींच सपने आज काग़ज़ पर सजायें हैं
,
निगाहों में हमें तेरी दिखा है प्यार ही साजन
मिले जो तुम हमें तो फूल अंगना में खिलायें हैं
,
कहेंगे बात दिल की अब निगाहों ही निगाहों से
सजन अब बात दिल की हम यहां तुमको सुनायें हैं
,
खुशी अपनी पिया कैसे बतायें आज हम तुमको
पिया हम संग दिल में प्यार भर कर आज लायें हैं
,
हवाएं भी यहां पर आज हमको छेड़ती साजन
कहे जोशी नज़ारों  से पिया दिल में समायें है

रेखा जोशी

काली अँधेरी रात
छूटा साये  का भी साथ
धड़कता दिल कांपते हाथ

लगता क्यों
न जाने
कोई है मेरे साथ
चल रहा संग मेरे
जगाता दिल में मेरे
इक आस
रख कर हिम्मत
बढ़ता चल न डर
झाँक दिल में अपने
थरथराती लौ दिये की
दिखा रही राह
स्याह अँधेरे में
लेकिन
फिर भी रहा मेरा
धड़कता दिल कांपते हाथ

भीतर ही भीतर
हो रही उजागर
राह मंज़िल की
थामे अपनी साँसे
नहीं दी बुझने
वह थरथराती लौ
रखती रही पग अपने
संभल संभल कर
लेकिन
फिर भी रहा मेरा
धड़कता दिल कांपते हाथ

रेखा जोशी

Monday, 14 August 2017

कुकुभ छंद

 छंद कुकुभ
यह चार पद का अर्द्धमात्रिक छन्द है. दो चरणों के हर पद में 30 मात्राएँ होती हैं और यति १६,१४ पर होती है, पदां त में दो गुरु आते है।

हे माखनचोर नन्दलाला ,है मुरली मधुर बजाये 
धुन सुन  मुरली की गोपाला ,राधिका मन  मुस्कुराये
चंचल नैना चंचल चितवन, राधा को मोहन  भाये  
कन्हैया से  छीनी मुरलिया  ,बाँसुरिया  अधर लगाये

छंद पर आधारित मुक्तक 

हे माखनचोर नन्दलाला ,है मुरली मधुर बजाये 
धुन सुन  मुरली की गोपाला ,राधिका मन मुस्कुराये 
चंचल नैना चंचल चितवन,  गोपाला से प्रीत लगी
कन्हैया से छीनी मुरलिया  , बाँसुरिया अधर लगाये 

रेखा जोशी 

Sunday, 13 August 2017

हिंडोले

हिंडोले
संस्मरण ( कृष्ण जन्माष्टमी पर)

मै और मेरी दादी दोनों हर त्यौहार मिल कर अलग ही अंदाज में मनाया करते थे ।मै बहुत ही भाग्यशाली हूं कि मुझे अपनी दादी का भरपूर स्नेह मिला।बात  कृष्ण जन्माष्टमी की है ।अमृतसर का एक बजार जिसके कोने में एक कुआं है ,जो " सुनियारा वाला खुह" के नाम से जाना जाता है,उसी बाज़ार में हम किराए के मकान में रहा करते थे ,मै बहुत छोटी थी लेकिन उस घर की और बजार की अमिट  यादें अभी भी मेरे  मानस पटल पर अंकित है।हमारे घर के आस पास बहुत से मंदिर हुए करते थे , कृष्ण जन्माष्टमी पर सांझ ढलते ही  सभी मंदिर खूबसूरत लाइट्स से जगमगाने लगते थे, औरमै अपनी दादी की ऊंगली थाम कर एक मन्दिर से दूसरे ,और दूसरे से तीसरे ,घर के आस पास कितने भी मन्दिर हुआ करते थे, सभी मंदिरों में हिंडोले(झांकियां) देखने जाया करती थी

हिंडोले देख कर बहुत अच्छा लगता था,लेकिन उससे भी अच्छा लगता था हर झांकी में छुपी कृष्ण की लीलाओं की  कहानी ,जिसे मेरी दादी बहुत खूबसूरत अंदाज में सुनाया  करती थी  । जैसे ,कान्हा का जन्म ,माखन चुराना ,गोपियों को सताना,कलिया नाग मर्दन,जितनी झांकियां देखती उतनी ही कहानियां । मेरी दादी रात को कृष्ण के जन्म लेने के बाद ही प्रसाद ग्रहण करती थी,और तब तक उनकी कहानियों का सिलसिला चलता रहता था। देर रात को हम घर आते थे और मै कृष्ण की कहानियों में डूबी कब सो जाती थी पता ही नहीं चलता  था ।

रेखा जोशी

Friday, 11 August 2017

खुशी से गीत साजन गुनगुनाना है


हमे तो अब  ख़ुशी से खिलखिलाना है 
सुमन उपवन पिया अब तो खिलाना है
मिली  है  ज़िन्दगी अब  मुस्कुराओ तुम
ख़ुशी  से  गीत  साजन   गुनगुनाना  है 
,

मीत आज ज़िन्दगी हमें  रही पुकार है
रूप देख ज़िन्दगी खिली यहां बहार है
पास पास  हम रहें मिले ख़ुशी हमें सदा
छोड़ना न हाथ आज छा रहा खुमार है

रेखा जोशी 

Thursday, 10 August 2017

प्रीति की लौ जलाने की बात कर


प्रीत की लौ जलाने की बात कर
साजन  प्यार निभाने की बात कर
,
पल दो पल की ज़िन्दगी अब जी लें
यूं न अब दिल दुखाने  की बात कर
,
खुला आसमां  बुला  रहा है हमें
जहां से दूर जाने की बात कर
,
बहुत रोये है जीवन में हम अब
ज़िन्दगी  मुस्कुराने की बात कर
,
अाई है चमन में  बहारें सजन
अब गीत गुनगुनाने की बात कर

रेखा जोशी

Wednesday, 9 August 2017

जो रंग बदलते गिरगिट सा


देख उसकाभोला सा चेहरा
नही पहचान उसको पाया 
बना मीत मेरा 
और 
दिल का हाल उसे बताया
निकाला जनाज़ा 
विश्वास का मेरे 
जग में मेरा मज़ाक बनाया 
बन दोस्त  मेरा 
दुश्मन सा वो सामने आया 
भगवान बचाये ऐसे 
दोस्तों से 
जो रंग बदलते गिरगिट सा 

रेखा जोशी 

है रंग बिरंगी मेरी चाहतें

है रंग बिरंगी मेरी चाहतें
उड़ने लगी आसमां को छूने
,
होने लगी दिल में मेरे हलचल
कल्पनाओं संग लगा मचलने
,
पकड़ डोर गुब्बारों के संग संग
छूने चला आसमां उड़ते उड़ते
,
छेड़ा हवा ने बादल ने पकड़ा
पगला दीवाना लगा खेलने
,
प्रीत के तराने गाने लगा दिल
साज प्रेम के आज  लगे बजने

रेखा जोशी

Saturday, 5 August 2017

सच्चाई की राह

एकांकी

""सच्चाई की राह"

कलाकार
पहला,दूसरा(सूत्रधार) मसखरे
सत्यम एक आदमी
प्रेरणा  सत्यम की पत्नी

स्टेज पर दो मसखरों का प्रवेश

पहला, जब मैं छोटा बच्चा था
दूसरा,झूठ बोल कर बड़ी शरारत करता था,मेरा झूठ पकड़ा जाता और  माँ से डांट खाता था,मुझे समझाने के  लिए मां नई नई कहानियां सुनाया करती थी।
पहला, अच्छा,मुझे भी सुनाओ न कहानी
दूसरा ,हां  एक कहानी याद आई,एक गांव में एक लड़का रहता था  , वह हर रोज़ सुबह सुबह भेड़ बकरियां चराने जंगल जाया करता था।
पहला ,फिर क्या हुआ
दूसरा , एक दिन उस शरारत सूझी
पहला ,अच्छा ,फिर क्या हुआ
दूसरा , वह झूठ मूठ ही जोर जोर से चिल्लाने लगा
पहला (हैरानी से)चिल्लाने लगा
दूसरा , हां चिल्लाने लगा "शेर आया,शेर आया बचाओ बचाओ"
पहला, क्या  शेर आया (हैरानी से)
दूसरा, अरे ,इसमें हैरान होने  की क्या बात है,सचमुच में थोड़ा कोई शेर आया था, वह तो झूठ बोल कर गांव वालों को डरा रहा था।
पहला, ओह,फिर क्या हुआ
दूसरा, फिर गांव  वाले लाठियां ले कर  भागे भागे उसे बचाने जंगल  आए
पहला अच्छा ,फिर क्या हुआ
दूसरा ,हा हा हा ,वह जोर जोर से हंसने लगा,,और ताली  पीट पीट कर गाने लगा"बुद्धू बनाया बड़ा मज़ा आया,बुद्धू बनाया बड़ा मज़ा आया"
पहला ओह यह तो उसने अच्छा नहीं किया
दूसरा, हां , बिलकुल अच्छा नहीं किया, पता फिर एक दिन वहां सचमुच शेर आ गया और वह डर गया ,जोर जोर से चिल्लाया,बचाओ शेर आया शेर आया
पहला,तब तो गांव वाले फिर से उसे बचाने के लिए  भागे
भागे जंगल में आए होंगे
दूसरा,नहीं ,सभी ने यही सोचा कि वह झूठ बोल रहा है और कोई भी उस बचाने जंगल की ओर नहीं गया
पहला , ओओ ह,फिर क्या हुआ
दूसरा ,फिर क्या ,शेर उसे मार कर खा गया
पहला ,ओह ,झूठ बोलने के कारण बेचारे को अपनी जान से हाथ धोने पड़े
दूसरा,यह तो  बहुत ही बुरा हुआ उसके  साथ, अगर उसने झूठ न बोला होता तो गांव वाले उसे शेर से बचा लेते ।

स्टेज पर सत्यम और उसकी पत्नी प्रेरणा का प्रवेशके

प्रेरणा ,अजय मुझे तुम पर गर्व है क़ि मै तुम्हारी पत्नी हूँ,तुम्हारा तो नाम ही  सत्यम है जो सदा  सच का साथ देता है

सत्यम , हां प्रेरणा मेरी ज़िंदगी संघर्ष की एक लंबी दास्ताँ है,बचपन क्या होता है मैंने देखा ही नही ,पांच वर्ष की आयु में सर से बाप का साया उठ गया ,गरीबी क्या होती है मुझ से पूछो

प्रेरणा ,लेकिन आज तो तुम्हारे पास सब कुछ है

सत्यम,हां आज मेरे पास सब कुछ है ,
लेकिन इस सब के पीछे  मेरी मां है  जिसने मुझे बचपन से ही सदा सच्चाई की कहानियां सुना कर उसका महत्व बताया ।
प्रेरणा, सही कहा मां ही अपने बच्चो को सच्चाई का पाठ पढा सकती है।
सत्यम , आज यहां तक पहुंचने के लिए मैने इक लम्बा  रास्ता तय किया है ,गाँव की टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों से मीलों दूर स्कूल का रास्ता,स्कूल से कालेज और कॉलेज से यूनिवर्सिटी का रास्ता,बच्चों को ट्यूशन देना ,घर का खर्चा  ,विधवा माँ की देखभाल और छोटे भाई की पढ़ाई का खर्चा और सबसे उपर सच्चाई की राह पर चलते रहना।

प्रेरणा, जानती हूँ तुमने कभी सच का साथ नहीं छोड़ा ,ज़िन्दगी में अपने को टूटने नही दिया ,झूठ का दामन पकड़ कर पैसा नहीं कमाया।

पहला हां, हिम्मते मर्दे मददे खुदा
दूसरा ,भगवान उनकी मदद करते है जो अपनी मदद खुद करते है
पहला ,जीवन एक चुनौती है
दूसरा चुनौती का स्वागत करो
पहला ,जीवन एक संघर्ष है
दूसरा संघर्ष का स्वागत करो
पहला ,सच्चाई की राह पर बढ़ते चलो
दूसरा, सच्चाई की राह पर बढ़ते चलो

रेखा जोशी

Friday, 4 August 2017

चलो दूर साजन बहारें पुकारे

122. 122. 122. 122

सजन  राह   देखें  नयन  यह  हमारे
लुभाते     हमें    खूबसूरत     नज़ारे
खिली आज कलियां यहां प्यार महके
चलो    दूर   साजन   बहारें    पुकारे

रेखा जोशी

आती ज़िन्दगी में भी धूप छांव


समय की बहती धारा से बंधी
यही तो है हम सभी की ज़िन्दगी
,
सुख दुख दो किनारे बहती धारा
खुशी गम जीवन में आना जाना
,
खिलतेे यहां कांटो में भी गुलाब
आती ज़िन्दगी में   भी धूप छांव
,
पल पल जुड़ी सांसों की डोर यहां
गर आज है जीवन कल मौत यहां
,
रचाया  प्रभु ने कैसा यहां खेला
आवन जावन  का लगाया मेला

रेखा जोशी

Thursday, 3 August 2017

गीत खुशी के हम सब गाएं


उपवन  में   फूल   मुस्कुराएं
दीप  नेह के सदा जगमगाएं
अरे अब ऐसी कविता लिखो
गीत  खुशी के हम सब गाएं

रेखा जोशी

Monday, 31 July 2017

खुशियों में खिलता गुलाब है ज़िन्दगी

माना उलझन की किताब है ज़िंदगी
लेकिन फिर भी लाजवाब है ज़िंदगी
,
आंसू  बहते कहीं मनाते जश्न यहां
देती सुख दुख   बेहिसाब   है ज़िंदगी
,
बदल रही रूप हर पल ज़िन्दगी यहां
रोज  नए  दिखाती ख्वाब है ज़िंदगी
,
ढलती शाम डूबता   सूरज हर रोज़
भोर का नया  आफताब  है ज़िंदगी
,
मिले गम खुशियां भी मिली हज़ार यहां
खुशियों में खिलता  गुलाब है  ज़िंदगी

रेखा जोशी

Sunday, 30 July 2017

अधूरी चाहतें अधूरे खवाब अधूरी ज़िंदगी

अधूरी चाहतें  अधूरे ख़्वाब अधूरी ज़िंदगी|
इंतज़ार है न जाने कब होगी पूरी ज़िंदगी||
.
डोल रही देख मंझधार में यह कश्ती हमारी|
गिरा दिये तुमने हाथों से पतवार भी ज़िंदगी||
.
थक गये नैन मेरे यहाँ राह तकते तुम्हारा|
.बेचैन आँखों को है इंतज़ार अब भी ज़िंदगी||
.
राह ज़िंदगी की मुश्किल होंगी इस कदर हमारी|
सोचा न था यह हमने ख़्वाब में भी कभी ज़िंदगी||

उखड़ रही यहाँ साँसे भी लम्हा लम्हा हमारी|
खत्म सब कुछ हो जायेगा जब न रहेगी ज़िंदगी||

रेखा जोशी

करते रहे इंतजार तेरा

झूठा निकला करार तेरा
मिला  ना हमको प्यार तेरा
,
थामा हाथ उम्र भर के लिये
न पाया फिर  दीदार  तेरा
,
खिले गुल गुलशन में बहारे
उतरा नहीं है  खुमार तेरा
,
रात दिन हम तुमको पुकारे
नाम लिया बार बार तेरा
,
चले आओ सजन घर अपने
करते  रहे इंतजार तेरा

रेखा जोशी

Friday, 28 July 2017

चांद निकला आंगन हमारे

शाम कठिन है रात कड़ी है
आंसूओं  की लगी  झड़ी है
,
राह  निहारे प्रियतम तेरी
पथ पर आज गोरी खड़ी है
,
चांद निकला आंगन हमारे
पिया मिलन की आज घड़ी है
,
खोये रहते सपनों में हम
जबसे साजन आंख लड़ी है
,
दिलों से दिल जोड़ कर देखो
लफ्जों की  बात बहुत बड़ी है

रेखा जोशी

Monday, 24 July 2017

खुशियाँ लेकर तब घर आँगनफिर आई नन्ही परी

याद है जब मिले थे हम तुम वो प्यारी सी मुलाकात
प्रीत तेरी  ने  दिल मे जगाये  थे   प्यार भरे जज़्बात
खुशियाँ लेकर तब घर आंगन फिर आई इक नन्ही परी
सारा जग अब जान गया है ,तेरी -मेरी-उसकी बात

रेखा जोशी

Saturday, 15 July 2017

मुक्तक

महिमा प्रभु की सदा मै गाती  रहूँ
शीश  अपना सदा मै  नवाती  रहूँ
जन जन  में  देखूँ  रूप मै  तुम्हारा
ख़ुशी सबके जीवन  में  लाती रहूँ
,

 है खिल खिल गये उपवन महकाते संसार
 फूलों  से  लदे  गुच्छे   लहराते  डार   डार
सज रही रँग बिरँगी पुष्पित सुंदर  वाटिका
भँवरें  अब   पुष्पों  पर  मंडराते  बार  बार

रेखा जोशी

Friday, 14 July 2017

सावन

सावन बरसा झूम के भीगा तन मन आज
पेड़ों   पर झूले पड़े  बजे   है मधुर  साज़
आई   बरसात  भीगे    से  अरमान लेकर
है भाया  आज भीगे  मौसम  का अंदाज़

रेखा जोशी

जाग जाओ देश मिलकर है बचाना

जाग जाओ देश मिलकर है बचाना
नींद में सोये हुओं को  है जगाना

साँस दुश्मन को मिटा कर आज लेंगे
साथ मिलकर है बुराई  को मिटाना

मिट गये है देश पर लाखो सिपाही
फौज की हिम्मत सभी को है बढ़ाना

देश के दुश्मन छिपें घर आज  अपने
पाठ उनको ढूँढ कर अब है पढ़ाना

दूर सीमा पर रहे सेना हमारी
पाक को अबतो सबक मिलकर सिखाना

रेखा जोशी

Thursday, 13 July 2017

गीतिका

गीतिका

( विजात छंद-1222 1222 समान्त-आई, पदांत-है )

घटा घनघोर छाई है
पिया की याद लाई  है
,
सखी झूले पड़े अँगना
सजन से अब जुदाई है
,
कहाँ हो  दूर तुम हमसे
यहाँ महफ़िल सजाई है
,
बिना तेरे  पिया अब तो
हमें  दुनिया न भाई है
,
मिला जब  प्यार जीवन मे
खुशी  भी संग  आई है

रेखा जोशी

है जननी जन्म भूमि हमारी

है जननी
जन्म भूमि हमारी
प्राणों  से भी
यह हमें प्यारी
अरे भारत उठ आँखे खोल
धरा रही है डोल
दुर्दशा देख किसानों की
इधर
मर रहे यहाँ वह
उधर
चले सीमा पर गोली
हाथ बंधे सिपाही के
और
पत्थरबाजी कश्मीर में
हद पार कर दी
आतंक के दरिंदों ने
मौत की नींद
सुला दिया
भोलेनाथ के भक्तों को
फड़क रही भुजाएं आज
खून खौलता रगों मेंअब
खुल गई पाक के
नापाक इरादों की अब पोल
अरे भारत! उठ ,आँखे खोल
देश अपना रहा बुला
अरे  भारत!उठ,आँखे खोल

रेखा जोशी

Sunday, 9 July 2017

गुरुवर महान

बहने लगी
ज्ञान की गंगा
आते ही
आषाढ़ मास की पूर्णिमा
शत शत करते
नमन
बांचते ज्ञान
गुरुवर महान
थे रचे वेद चारो
लबालब ज्ञान से
परम् ज्ञानी मुनि
व्यास ने
गुरु पूर्णिमा से
वन्दन कर प्रभु का
शत शत करते
नमन
प्रभु का
दिया जो हमे वरदान
गुरुवर भेजा धरा पर
राह दिखाता जीवन में
शत शत नमन
करते
गुरुवर का
मार्गदर्शक बन
जीना सिखाता
बारम्बार
नमन करते
गुरुवर महान
गुरुवर महान

रेखा जोशी

Thursday, 6 July 2017

गीतिका


मापनी  - 122   122. 122. 122

पिया आज तुमको मनाने चला हूँ
सदा साथ तेरा    निभाने  चला हूँ
,
सहारा  मिला आज तो  ज़िंदगी में
गिले औऱ शिकवे मिटाने  चला हूँ

नहीं अब बहारें   नज़ारे  नहीं अब
यहाँ फूल उपवन  खिलाने चला हूँ
,
भुला कर सभी गम यहाँ ज़िन्दगी में
सजन ज़िन्दगी अब बनाने चला हूँ
,
मिला साथ तेरा मिली आज मंज़िल
यहाँ आज   जीवन बिताने चला हूँ

रेखा जोशी

जीवन के पिया आया मौसम बहार का

जीवन में पिया   आया मौसम बहार  का
पूछे  वो  काश   हाल  दिले   बेकरार  का
बेशुमार सा नशा छाया रहे  अब  तो सदा
कर भी लो सजना आज इकरार प्यार का

रेखा जोशी

Wednesday, 5 July 2017

मेरी सतरंगी कल्पनायें

मेरी सतरंगी कल्पनायें

उड़ती गगन में
मेरी सतरंगी कल्पनायें
झूलती इंद्रधनुष पे
बहती शीतल पवन सी
ठिठकती कभी पेड़ों के झुरमुट पे
थिरकती कभी अंगना में मेरे
सूरज की रश्मियों से
महकाती  गुलाब गुलशन में मेरे
तितलियों सी झूमती
फूलों की डाल पे
दूर उड़ जाती फिर
लहराती सागर पे
चूमती श्रृंखलाएँ पर्वतों की
बादल सी गरजती कभी
चमकती दामिनी सी
बरसती बरखा सी कभी
बिखर जाती कभी धरा पे
शीतल चाँदनी सी
नित नये सपने संजोती
रस बरसाती जीवन में मेरे
मेरी सतरंगी कल्पनायें

रेखा जोशी

न हो हमसे खफा अब ज़िन्दगी में

तुझे चाहें सदा अब ज़िंदगी में 
न हो हमसे  खफा अब ज़िंदगी में

रहे तन्हा बिना तेरे सहारे
सताये गी वफ़ा अब ज़िंदगी में

बहुत रोये सनम तेरे लिये हम
नही कुछ भी कहा अब ज़िंदगी में

तड़प तुम यह हमारी देख ले अब
मिले जो इस दफा अब  ज़िंदगी में

न कर शिकवा बहारों से सनम तू 
नही वह  बेवफा अब ज़िंदगी में

रेखा जोशी

घन घन गरजता आया सावन
रिम झिम बरसता आया सावन
पहन   बरसाती ले   लो  छाता
मन को भी  बहुत भाया सावन

रेखा जोशी

Tuesday, 4 July 2017

आसमाँ से पकड़ सितारे यहाँ लायेंगे

आसमाँ  से   पकड़    सितारे  यहाँ   लायेंगे
सितारों  संग   आज  हम महफ़िल सजायेंगे
मिल   बैठेंगे   फिर  दोनों   उनके   संग संग
कुछ  उनकी  सुनेंगे   कुछ  अपनी  सुनायेंगे

रेखा जोशी

Monday, 3 July 2017

संस्मरण

संस्मरण

बात उन दिनों की है जब दिवाली से पूर्व हमारे  घर में सफेदी और रंगाई पुताई का काम चल रहा था ,मेरो आयु करीब दस वर्ष की होगी,,मेरे मम्मी पापा कुछ जरूरी काम से घर से बाहर गए हुए  थे ,पूरे घर का  सामान बाहर आँगन  में बिखरा हुआ था ,घर  के सभी कमरे लगभग खाली से थे और मेरे छोटे भाई बहन मस्ती में एक कमरे से दूसरे कमरे  में  छुपन छुपाई खेलते हुए इधर उधर शोर शराबा करते हुए भाग रहे थे,लेकिन मै सबसे बड़ी होने के नाते अपने आप को उनसे अलग कर लेती थी ,उन दिनों मुझे फ़िल्मी गीत सुनने का बहुत शौंक हुआ करता था ,बस जब भी समय मिलता मै  रेडियो से चिपक कर गाने सुनने और गुनगुनाने लग जाती थी ,उस दिन भी मै रेडियो पर कान लगाये गुनगुना रही थी।

उस कमरे में सामान के नाम पर बस एक ड्रेसिंग टेबल और एक मेज़ पर रेडियो था  जहां खड़े हो कर मै अपने भाई बहनों की भागम भाग से बेखबर मे संगीत की दुनिया में खोई हुई थी ,तभी बहुत जोर से धड़ाम की आवाज़ ने मुझे चौंका दिया ,आँखे उठा कर देखा तो ड्रेसिंग टेबल फर्श पर गिर हुआ था और उस  खूबसूरत आईने के अनगिनत छोटे छोटे टुकड़े पूरे फर्श पर बिखर हुए थे,वहां उसके पास खड़ी मेरी छोटी बहन रेनू जोर जोर से रो रही थी ,ऐसा दृश्य देख मेरा दिल भी जोर जोर से धडकने लगा था ,मै भी बुरी तरह से घबरा गई  थी ,एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा कहीं रेनू को कोई चोट तो नही आई ,लेकिन नही वह भी बुरी तरह घबरा गई थी ,क्योकि वह खेलते खेलते ड्रेसिंग टेबल के नीचे छुप गई थी और जैसे ही वह बाहर आई उसके  कारण  ड्रेसिंग टेबल का संतुलन बिगड़ गया और आईना फर्श पर गिर कर चकना चूर हो गया था ।

हम दोनों बहने डर  के मारे वहां से भाग कर अपने नाना के घर जा कर दुबक कर बैठ गई ,जो कि हमारे घर के पास ही था ,कुछ ही समय बाद ही वहां पर हमारी मम्मी के फोन आने शुरू हो गए और फौरन हमे घर वापिस आने के लिए कहा गया ,मैने रेनू को वापिस  घर चलने  के लिए कहा परन्तु वह डरी  हुई वहीं दुबकी बैठी रही ,बड़ी होने के नाते मुझे लगा कि हम कब तक छुप कर बैठे रहें गे ,हौंसला कर मै  घर की और चल दी और मेरे पीछे पीछे रेनू भी घर आ गई । जैसे ही मैने घर के अंदर कदम रखा एक ज़ोरदार चांटा मेरे गाल पर पड़ा ,सामने मेरी मम्मी खड़ी थी । मै हैरानी से उनका  मुहं देखती रह गई  ,''यह क्या गलती रेनू ने की और पिटाई मेरी '' बहुत गुस्सा आया मुझे अपनी माँ पर  जबकि गलती मेरी छोटी बहन से हुई थी ,बहुत रोई थी उस दिन मै ।

आज जब भी मै पीछे मुड़ कर उस घटना को याद करती हूँ तो फर्श पर बिखरे वो आईने के टुकड़े मेरी आँखों के सामने तैरने लगते है और अब मै समझ सकती हूँ कि अपने मम्मी पापा  की अनुपस्थिति में बड़ी होने के नाते मुझे अपने घर का ध्यान रखना चाहिए था ,मुझे अपनी बहन रेनू को ड्रेसिंग टेबल के नीचे छुपने से रोकना चाहिए था । वह चांटा मुझे मेरी लापरवाही के कारण पड़ा था। उस चांटे ने मुझे जीवन में अपनी जिम्मेदारी का अर्थ  समझाया था।

रेखा जोशी

दोहे सावन पर

दोहे [सावन पर ]

नभ पर बादल गरजते ,घटाएँ है घनघोर ।
रास रचाये दामिनीे  ,मचा  रही  है शोर ॥

आँचल लहराती  हवा ,पड़े ठंडी फुहार |
उड़ती जाये चुनरिया ,बरखा की बौछार ||

सावन बरसा झूम के ,भीगा तन मन आज ।
पेड़ों पर झूले पड़े ,, बजे है मधुर साज़ ॥

भीगा सा मौसम यहाँ  ,भीगी सी है रात ।
भीगे से अरमान है ,आई है बरसात ॥

कुहुक रही कोयल यहाँ, अम्बुआ डार डार।
हरियाली छाई रही,चहुँ ओर है बहार

रेखा जोशी

हिम्मत औऱ उम्मीद पर टिकी है ज़िन्दगी


अक्सर
जीवन के सफर में
होते है प्रयास असफल
चलता नही समतल
जीवन का रथ कभी
है रू ब रू होना
पड़ता कभी कभी
असफलता की
गहराइयों से भी
लेकिन
न छूटे आस कभी
विश्वास की नींव पर
मिलेगी
सफलता कभी
दो रूप है जीवन के
गर आज
खाई है गहराई
तो कल
मिलेगी ऊँचाई
हिम्मत औऱ उम्मीद पर
है टिकी
ज़िन्दगी

रेखा जोशी

Sunday, 2 July 2017

ग़ज़ल

प्रदत बहर- ख़फ़ीफ मख़बून महज़ूफ मक़तूअ

अर्कान- फाइलातुन मफाइलुन फेलुन
वज़्न-  २१२२/१२१२/२२

काफ़िया अर
रदीफ़- पर है

चल रहे  प्यार की डगर पर है
अब मिला प्यार ही  सफर पर है

है   हमें   इंतज़ार तेरा  अब
राह तेरी पिया  नज़र  पर है

हम कभी प्यार को नहीं भूले
चाहतें भी अभी मगर पर है

छोड़ना ना कभी हमें साजन
आज तो प्यार आप घर पर हैं

आप आ कर चले गये थे पर
प्यार अपना पिया अमर पर है

रेखा जोशी